Wednesday, November 29, 2017

राजकुमार हिरानी

राजकुमार हिरानी- अपने समय के चंद उन फिल्मकारों में से है जिनमें फिल्म निर्माण की विलक्षण प्रतिभा हैं।
20 नवम्बर 1962 को नागपुर में जन्मे पले बढ़े राजकुमार हिरानी एक साधारण मध्यमवर्गीय सिंधी परिवार से आते हैं। बचपन से उनकी फिल्मों में रूचि को देखकर उनके पिता ने उन्हें बाकायदा फिल्म शिक्षा लेने की सलाह दी। जिसके बाद उन्होंने फिल्म एवं टेलिविज़न इंस्टीट्यूट में प्रवेश किया। संपादन की कला उन्होंने वही सीखी। 
राजकुमार हिरानी ने मुन्नाभाई एमबीबीएस के निर्देशन से पहले विज्ञापन निर्माण भी किया व काफी हद तक सफल भी रहे। कुछ समय विज्ञापन जगत के बाद राजकुमार हिरानी ने रूख किया फिल्म संपादन का। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 1942-ए लव स्टोरी और करीब के टरेलर उन्होंने बनाए। साथ ही, विधु विनोद चोपड़ा की ही फिल्म मिशन कश्मीर में पहली बार फिल्म संपादक की जिम्मेदारी संभाली।
2006 से 2016 तक बतौर निर्देशक राजकुमार हिरानी 4 फिल्में बना चुके हैं। उनकी फिल्में इसलिए खास लगती है क्योंकि उनमें सामाजिक संदेश देने का बेहद सहज अंदाज़ हैं। एक पल में आपको हंसा सकती हैं और दूसरे ही पल आपको रूला सकती हैं। सटीक संदेश और दिलचस्प अंदाज़।
राजकुमार हिरानी बताते हैं कि महज 10 साल की उम्र में फिल्म आनंद देखकर वह बेहद प्रभावित हुए थे। याद करके बताते है कि वे शायद उनकी फिल्मों की तरफ रूझान की शुरुआत थी जो निरंतर बढ़ती गई। वह ऋषिकेश मुखजी के अलावा विमल रॉय , बसु चटर्जी जैसे फिल्मकारों को प्रेरणा बताते हैं। गहन सामाजिक बात सरलता से कहने का हुनर राजकुमार हिरानी ने शायद इन्हीं महान फिल्मकारों से सीखा हैं।
राजकुमार हिरानी अक्सर ये बताते है कि उनकी फिल्मों की गहरी प्रेरणा ऋषिकेश मुखजी हैं। गाहे-बगाहे राजकुमार हिरानी की फिल्में देखकर उनकी प्रेरणा पुख्ता लगती हैं। मसलन, पीके के आखिरी दृश्य में अनुष्का शमा का पुस्तक पाठन आनंद के अमिताभ बच्चन के किरदार की याद दिलाता हैं। दोनों की फिल्मों में समानता यह भी नजर आती है कि एक ऐसा किरदार गढना जो सामाजिक ताने-बाने से अलग, अलग सोच, अलग समझ, अलग अंदाज जो फिल्म के बाकी किरदारो को यही सीख देता नज़र आता है-it's simple to be happy but it's difficult to be simple.

किरदार से कलाकार

किरदार हमेशा कलाकार से बड़ा होता हैं। कलाकार के तामझाम के पीछे का कलाकार दिखाना एक उम्दा कलाकार की पहचान हैं। याद कीजिए वो सभी पसंदीदा किरदार जिन्हें हमने बड़े परदे पर देखा, सराहा और अपनाया। असल में वही किरदार आज अमर हैं और हमेंशा रहेंगे जिन्हें अदा करने वाले अभिनेता या अभिनेत्री ने खुद से ज्यादा तरजीह दी।
अभिनेता राजेश खन्ना की ख्याति किसी भी दौर में किसी से भी छिपी नहीं रही। उनके द्वारा जीवंत किया गया हर किरदार पहले वह किरदार लगता हैं फिर राजेश खन्ना। साल 1971में आई फिल्म आनंद को कौन भूल सकता है। आनंद की कहानी को देखते हुए हमें नहीं लगता कि हम परदें पर किसी स्टार को देख रहे हैं, लगता है कि ये आनंद ही हैं और ये उसकी कहानी।
ऋषिकेश मुखजी की ही 1980 में आयी फिल्म खूबसूरत में अभिनेत्री रेखा का किरदार मंजू। अपने दौर की स्टाइल आइकॉन और ग्लैमरस रेखा मंजू के किरदार मे बेहद सहज और साधारण लगी हैं मानो घर की ही कोई सदस्या। कहा जा सकता हैं कि ये कहानी कहने वाले पर भी निभर्र करता है पर ये भी सच है कि अभिनेता ही परदे पर किरदार को उकेरता है।
समकालीन फिल्मों में ये कला थोड़ी मुश्किल हुईं हैं। स्टार कल्चर में किरदार को खोजना ज़रा मुश्किल जान पड़ता है। कम ही ऐसे कलाकार है जो यकीन करवा पाते हैं, ये उन कलाकारों की श्रेष्ठता ही हैं।
40 साल की उम्र के ऊपर के अभिनेता आमिर खान 3 इडियट में 23-24साल के छात्र हैं। असल में उनके प्रिंसिपल की भूमिका करने वाले बमन ईरानी से महज 6 साल ही छोटे हैं पर ये एक कलाकार की कला ही है जो हमें उन किरदारो पर यकीन करवाती हैं।
ऐसा नहीं हैं , बहुत से किरदार काफ़ी बार स्टार चकाचौंध से निकल ही नहीं पाते। उमंग कुमार की फिल्म सरबजीत में अभिनेत्री ऐश्वर्या राय में दलवीर कौर को देखना मुश्किल था। यही हाल सोनम कपूर के पीछे नीरजा का हुआ। सुल्तान में सलमान ख़ान हटे नहीं कि उनका किरदार नज़र आ पाता।
फिल्म निर्माण एक टीम वरक है, इसमें सिर्फ स्टार को दोष नहीं दिया जा सकता। शायद हम जिस दौर में हैं, वहां स्टारडम इतना हावी है कि हम चाह कर भी कलाकार और किरदारों को अलग नहीं कर पाते। अभिनेता किरदार पर हावी हो ही जाता हैं, निस्संदेह कुछ अपवाद हमेशा रहते हैं।