राजकुमार हिरानी- अपने समय के चंद उन फिल्मकारों में से है जिनमें फिल्म निर्माण की विलक्षण प्रतिभा हैं।
20 नवम्बर 1962 को नागपुर में जन्मे पले बढ़े राजकुमार हिरानी एक साधारण मध्यमवर्गीय सिंधी परिवार से आते हैं। बचपन से उनकी फिल्मों में रूचि को देखकर उनके पिता ने उन्हें बाकायदा फिल्म शिक्षा लेने की सलाह दी। जिसके बाद उन्होंने फिल्म एवं टेलिविज़न इंस्टीट्यूट में प्रवेश किया। संपादन की कला उन्होंने वही सीखी।
राजकुमार हिरानी ने मुन्नाभाई एमबीबीएस के निर्देशन से पहले विज्ञापन निर्माण भी किया व काफी हद तक सफल भी रहे। कुछ समय विज्ञापन जगत के बाद राजकुमार हिरानी ने रूख किया फिल्म संपादन का। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 1942-ए लव स्टोरी और करीब के टरेलर उन्होंने बनाए। साथ ही, विधु विनोद चोपड़ा की ही फिल्म मिशन कश्मीर में पहली बार फिल्म संपादक की जिम्मेदारी संभाली।
2006 से 2016 तक बतौर निर्देशक राजकुमार हिरानी 4 फिल्में बना चुके हैं। उनकी फिल्में इसलिए खास लगती है क्योंकि उनमें सामाजिक संदेश देने का बेहद सहज अंदाज़ हैं। एक पल में आपको हंसा सकती हैं और दूसरे ही पल आपको रूला सकती हैं। सटीक संदेश और दिलचस्प अंदाज़।
राजकुमार हिरानी बताते हैं कि महज 10 साल की उम्र में फिल्म आनंद देखकर वह बेहद प्रभावित हुए थे। याद करके बताते है कि वे शायद उनकी फिल्मों की तरफ रूझान की शुरुआत थी जो निरंतर बढ़ती गई। वह ऋषिकेश मुखजी के अलावा विमल रॉय , बसु चटर्जी जैसे फिल्मकारों को प्रेरणा बताते हैं। गहन सामाजिक बात सरलता से कहने का हुनर राजकुमार हिरानी ने शायद इन्हीं महान फिल्मकारों से सीखा हैं।
राजकुमार हिरानी अक्सर ये बताते है कि उनकी फिल्मों की गहरी प्रेरणा ऋषिकेश मुखजी हैं। गाहे-बगाहे राजकुमार हिरानी की फिल्में देखकर उनकी प्रेरणा पुख्ता लगती हैं। मसलन, पीके के आखिरी दृश्य में अनुष्का शमा का पुस्तक पाठन आनंद के अमिताभ बच्चन के किरदार की याद दिलाता हैं। दोनों की फिल्मों में समानता यह भी नजर आती है कि एक ऐसा किरदार गढना जो सामाजिक ताने-बाने से अलग, अलग सोच, अलग समझ, अलग अंदाज जो फिल्म के बाकी किरदारो को यही सीख देता नज़र आता है-it's simple to be happy but it's difficult to be simple.
Wednesday, November 29, 2017
राजकुमार हिरानी
किरदार से कलाकार
किरदार हमेशा कलाकार से बड़ा होता हैं। कलाकार के तामझाम के पीछे का कलाकार दिखाना एक उम्दा कलाकार की पहचान हैं। याद कीजिए वो सभी पसंदीदा किरदार जिन्हें हमने बड़े परदे पर देखा, सराहा और अपनाया। असल में वही किरदार आज अमर हैं और हमेंशा रहेंगे जिन्हें अदा करने वाले अभिनेता या अभिनेत्री ने खुद से ज्यादा तरजीह दी।
अभिनेता राजेश खन्ना की ख्याति किसी भी दौर में किसी से भी छिपी नहीं रही। उनके द्वारा जीवंत किया गया हर किरदार पहले वह किरदार लगता हैं फिर राजेश खन्ना। साल 1971में आई फिल्म आनंद को कौन भूल सकता है। आनंद की कहानी को देखते हुए हमें नहीं लगता कि हम परदें पर किसी स्टार को देख रहे हैं, लगता है कि ये आनंद ही हैं और ये उसकी कहानी।
ऋषिकेश मुखजी की ही 1980 में आयी फिल्म खूबसूरत में अभिनेत्री रेखा का किरदार मंजू। अपने दौर की स्टाइल आइकॉन और ग्लैमरस रेखा मंजू के किरदार मे बेहद सहज और साधारण लगी हैं मानो घर की ही कोई सदस्या। कहा जा सकता हैं कि ये कहानी कहने वाले पर भी निभर्र करता है पर ये भी सच है कि अभिनेता ही परदे पर किरदार को उकेरता है।
समकालीन फिल्मों में ये कला थोड़ी मुश्किल हुईं हैं। स्टार कल्चर में किरदार को खोजना ज़रा मुश्किल जान पड़ता है। कम ही ऐसे कलाकार है जो यकीन करवा पाते हैं, ये उन कलाकारों की श्रेष्ठता ही हैं।
40 साल की उम्र के ऊपर के अभिनेता आमिर खान 3 इडियट में 23-24साल के छात्र हैं। असल में उनके प्रिंसिपल की भूमिका करने वाले बमन ईरानी से महज 6 साल ही छोटे हैं पर ये एक कलाकार की कला ही है जो हमें उन किरदारो पर यकीन करवाती हैं।
ऐसा नहीं हैं , बहुत से किरदार काफ़ी बार स्टार चकाचौंध से निकल ही नहीं पाते। उमंग कुमार की फिल्म सरबजीत में अभिनेत्री ऐश्वर्या राय में दलवीर कौर को देखना मुश्किल था। यही हाल सोनम कपूर के पीछे नीरजा का हुआ। सुल्तान में सलमान ख़ान हटे नहीं कि उनका किरदार नज़र आ पाता।
फिल्म निर्माण एक टीम वरक है, इसमें सिर्फ स्टार को दोष नहीं दिया जा सकता। शायद हम जिस दौर में हैं, वहां स्टारडम इतना हावी है कि हम चाह कर भी कलाकार और किरदारों को अलग नहीं कर पाते। अभिनेता किरदार पर हावी हो ही जाता हैं, निस्संदेह कुछ अपवाद हमेशा रहते हैं।
Thursday, September 14, 2017
काश.......
जितना आराम एक बच्चे को अपनी माँ की गोद में मिलता हैं यकीन मानिए उतना ही आराम उस माँ को भी मिलता हैं जब वो अपने बच्चे को गले लगाती हैं, उसे हंसते हुए देखती हैं।
उस मां के दर्द का क्या कहूं जिसने अपने 7 साल के छोटे मासूम से बच्चे को खो दिया हो। उसका दुख शब्दों से परे हैं। सुबह उसे तैयार करते हुए , खाना खिलाते हुए, जाते हुए प्यार से हाथ हिलाते हुए, उसने कल्पना भी नहीं की होगी कि ये आखिरी बार वो अपने बच्चे को हंसते हुए देख रही है। आज के बाद ऐसा कुछ नही होगा। सोच कर ही दिल बैठ जाता हैं। जिस पर बीती है उसके गम की तो कोई अथाह ही नहीं हैं।
कैसे संभालेंगे उस बच्चे के मां-बाप खुद को..... पता नहीं।
मेरे ही जह़न से नहीं जा रहा उसका मासूम चेहरा, जबकि मैं तो अजनबी हूँ। 8 सितम्बर से पहले तो मैंने उसका नाम भी नही सुना था। कोई जान-पहचान नही फिर भी आंखों से आंसू बहने लगते है।मन कांपने लगता है ये सोचकर कि कितना तड़पा होगा वो बच्चा कितना डर गया होगा चाकू देखकर... उफ्फ।
ये ख्याल बार बार मन में आता है कि काश उस दिन वो बाथरूम जाता ही नहीं, काश समय का कुछ ऐसा फेर हो जाता कि कातिल तभी बाहर चला जाता, या उसी वक्त वहां कोई बड़ा आ जाता, काश कुछ तो होता जिससे वो ना होता जो हुआ।
ये होना ही था, पर इतनी कूर मौत भगवान किसी को ना दे और किसी बच्चे को तो कभी नहीं।
Friday, September 8, 2017
Just a day
We don't feel respected. Even at some point, we feel disgraced. We here stands for TEACHERS or FACULTY, our glorified name.
I sometime ask myself do we really
not worth for respect. Are we not doing our job correctly, honestly? The way it should be done. Is this the reason why we are disrepected or is it their nature to mock everyone? What are the expectations? May be they feel powerful when they laugh at someone in a group.
Whom should we blame? Students, institution, society, modernization, media or faculty themselves. Situation is actually getting dangerous. It's not about a students or group of students or any particular batch, situation has changed. One, they don't want to study. Two, all they want is attendence. Three, they actually doesn't know how to respect or even how to behave in front of a person(forget about the teacher) who is elder to them in terms of experience, education and age.
I wonder if they behave similarly with their parents or they just have this behavior exclusively for teachers.
I wonder if they have inculcated this attitude since schools and if yes, we should check our primary and secondary eduation system.
Because you what happen a teacher who actually want to impart knowledge to his students get demotivated after seeing such bulk of students. And then very soon he only start narrating topics. It's through a personal experience. May be there are people who are more tolerant to such things.
But something has to be done soon regarding this problem. Atleast before a point when teachers start surrender.
Please don't get judgemental. My day today was good. I do feel sometime like this.