जितना आराम एक बच्चे को अपनी माँ की गोद में मिलता हैं यकीन मानिए उतना ही आराम उस माँ को भी मिलता हैं जब वो अपने बच्चे को गले लगाती हैं, उसे हंसते हुए देखती हैं।
उस मां के दर्द का क्या कहूं जिसने अपने 7 साल के छोटे मासूम से बच्चे को खो दिया हो। उसका दुख शब्दों से परे हैं। सुबह उसे तैयार करते हुए , खाना खिलाते हुए, जाते हुए प्यार से हाथ हिलाते हुए, उसने कल्पना भी नहीं की होगी कि ये आखिरी बार वो अपने बच्चे को हंसते हुए देख रही है। आज के बाद ऐसा कुछ नही होगा। सोच कर ही दिल बैठ जाता हैं। जिस पर बीती है उसके गम की तो कोई अथाह ही नहीं हैं।
कैसे संभालेंगे उस बच्चे के मां-बाप खुद को..... पता नहीं।
मेरे ही जह़न से नहीं जा रहा उसका मासूम चेहरा, जबकि मैं तो अजनबी हूँ। 8 सितम्बर से पहले तो मैंने उसका नाम भी नही सुना था। कोई जान-पहचान नही फिर भी आंखों से आंसू बहने लगते है।मन कांपने लगता है ये सोचकर कि कितना तड़पा होगा वो बच्चा कितना डर गया होगा चाकू देखकर... उफ्फ।
ये ख्याल बार बार मन में आता है कि काश उस दिन वो बाथरूम जाता ही नहीं, काश समय का कुछ ऐसा फेर हो जाता कि कातिल तभी बाहर चला जाता, या उसी वक्त वहां कोई बड़ा आ जाता, काश कुछ तो होता जिससे वो ना होता जो हुआ।
ये होना ही था, पर इतनी कूर मौत भगवान किसी को ना दे और किसी बच्चे को तो कभी नहीं।
Thursday, September 14, 2017
काश.......
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